Tribute From: Banshidhar

श्रीमान जगन्नाथ जी के साथ वृतांत

ये वृत्तांत तब का है जब मैं (बंशीधर शर्मा) राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय रतकूड़िया में सन् 1963 से तृतीय श्रेणी अध्यापक के रूप में कार्यरत था। सन् 1970 में मेरी मुलाकात श्री जगन्नाथ जी व्यास से हुई। वे राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय फेफाना से प्रथम श्रेणी अध्यापक के रूप में स्थानांतरित होकर हमारे विद्यालय में आए थे। उस समय मैं जनगणना प्रभारी के रूप में नियुक्त था। मेरे द्वारा सभी शिक्षकों को जनगणना के लिए आदेश दिए जा चुके थे। उनमें से एक शिक्षक आवश्यक कार्य के कारण छुट्टी पर चला गया। जनगणना के कारण एवं रविवारीय अवकाश होने के कारण विद्यालय में कोई भी नहीं था। मेरे समक्ष श्री जगन्नाथ जी के अतिरिक्त अन्य कोई अध्यापक नहीं था, अतः मैंने जनगणना के कार्य हेतु आदेश लिखकर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को आदेश के साथ उनके घर जोधपुर भेज दिया और लिखकर भेजा कि यदि इस कार्यादेश की अवहेलना की गई तो इसकी जवाबदारी के लिए आप स्वयं जिम्मेदार होंगे। यह आदेश हम दोनों के बीच परिचय एवं मधुर संबंध का कारण बना, क्योंकि एक तृतीय श्रेणी अध्यापक, प्रथम श्रेणी अध्यापक को लिखित आदेश दे रहा था। यह आदेश हमारे परिचय का माध्यम बना, जो न केवल 1970 में बल्कि सदैव के लिए हमारे बीच मधुर संबंध का कारण बना।

सन् 1970 में श्री मंजुल राय खरे हेड मास्टर के रूप में आए। चूँकि 11वीं की परीक्षा की भी बोर्ड ने मान्यता दे रखी थी, जब वार्षिक परीक्षा आई तो बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एवं कक्षा 11वीं के पाँच (5) विषयों के अनुसार बोर्ड को नंबर भेजने होते थे। मैं कक्षा दसवीं को हिंदी विषय पढ़ाता था और जगन्नाथ जी 11वीं को पढ़ाते थे, परंतु विद्यार्थियों के प्रति जगन्नाथ जी के सरल स्वभाव तथा मेरे कड़क स्वभाव को देखते हुए खरे साहब ने मुझे ही 11वीं के हिंदी विषय के पाँच में से नंबर देने के आदेश दे दिए। मेरे कहने पर कि नियम के तहत 11वीं के नंबर जगन्नाथ जी देंगे, इसके उपरांत भी खरे साहब ने मुझे ही नंबर देने को कह दिया। यह बात नियमानुसार जगन्नाथ जी को बुरी लगी, परंतु मेरे सहज भाव के कारण मैं उनके और भी नज़दीक तथा प्रिय बन गया। अगले वर्ष से ही बोर्ड ऑफ सेकेंडरी ने जो 5 नंबर विषयवार देय थे, वे आदेश निरस्त कर दिए। जब भी मैं किसी समस्या में फँसता, तो उन्हीं के पास जाकर सलाह लेता और उनकी राय लेना मुझे उत्तम लगता।

सन् 1972 में रतकूड़िया के हेड मास्टर श्री मंजुल राय खरे द्वारा प्रथम एवं अंतिम बार श्री जगन्नाथ जी को विद्यालय की ‘बीचिका’ पत्रिका का संपादक बनाया गया। मैं 1968 में अजमेर से बी.एड. करके निकला था। तब से कविता लिखने का अभ्यास हो चुका था। मेरी लिखी कविताओं में से एक कविता—

सुधरी तन की काया से, जागी है मन की प्यास।
छलकी है मन की गगरी, आया है मधुमास।।

उक्त कविता मैंने 31.12.1969 को लिखी थी। मैंने यह कविता जगन्नाथ जी को दिखाई। उन्हें कविता बहुत पसंद आई और उन्होंने उसे ‘बीचिका’ पत्रिका में स्थान दिया। जब भी मैं यह कविता देखता हूँ, तो जगन्नाथ जी की याद आए बिना नहीं रहती और मेरा मस्तक इस कृतज्ञता और प्रेम के समक्ष नतमस्तक हो जाता है।

सन् 1979 में मेरा द्वितीय श्रेणी में गोपालसर (बालेसर), जिला शेरगढ़ स्थानांतरण हो गया और जगन्नाथ जी का राजकीय नवीन उच्च माध्यमिक विद्यालय, जोधपुर में हो गया। उसी समय जोधपुर विश्वविद्यालय (वर्तमान में जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय, ओल्ड कैंपस), जो निकट ही है, के विद्यार्थियों ने हड़ताल कर दी। चूँकि राजकीय नवीन उच्च माध्यमिक विद्यालय पास ही स्थित है, विश्वविद्यालय के विद्यार्थी विद्यालय में आ गए। विद्यालय के अन्य अध्यापकों ने डर के मारे विद्यालय के विद्यार्थियों को छोड़ दिया, परंतु श्री जगन्नाथ जी अपनी कक्षा में पढ़ाते रहे। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि यदि आप जाना चाहें तो जा सकते हैं, परंतु एक भी विद्यार्थी कक्षा छोड़कर बाहर नहीं गया। यह देखकर विश्वविद्यालय के विद्यार्थी बिना कक्षा को परेशान किए स्वयं वहाँ से चले गए। शिक्षा एवं अपने कर्तव्य के प्रति उनकी कर्मठता अडिग थी।

वे मेरे लिए जीवन के सुधारक एवं पथ-प्रदर्शक बने, जो आज भी प्रातः स्मरणीय एवं नमन के अधिकारी हैं। उन्होंने हमें दाता साहेब के दर्शन करवा कर सत्यमार्ग पर लगाया और जीवन का उद्धार कर दिया।

— बंशीधर शर्मा