आधुनिक शिक्षा-प्रणाली कितनी सार्थक ?

प्रबोध: आधुनिक शिक्षा-प्रणाली कितनी सार्थक? बात सन् 1957-58 की है। तब राजस्थान  विश्वविद्यालय का दर्शन- विभाग जोधपुर में ही स्थित था। उस विभाग में एक अमरीकन प्रोफेसर वेदान्त पर  अनुगन्धान करने के लिए आये हुए थे। विभाग में समय  समय पर उनके व्याख्यानों का आयोजन किया जाता था। एसे ही एक अवसर पर प्रोफेसर महादय न एक व्याख्यान में आधुनिक शिक्षा के गुणाः आर का विस्तृत विवेचन किया, उनका व्याख्यान समाप्त हो जान के पश्चात एक छात्र ने उनसे पूछा, जिस शिक्षा प्रणाली से इस प्रकार क अनुशासनहीन, उद्दण्ड और स्वच्छाचारी नागरिकों का निर्माण होता हा उस शिक्षा-प्रणाली पर इस प्रकार अरबों डॉलर व्यय करना उचित है क्या प्राफेसर महोदय एक क्षण क लिए विचारमग्न दिखाई दिये और फिर कहा “यदि हम एक शताब्दी में भी में कहा था, तुम्हारे प्रश्न सुविचारित हैं, परन्तु हमको उनके उत्तर आते नहीं, अतएव ऐसे प्रश्न पूछ कर हमें दुविधा में डालने का प्रयत्न छोड़ दोगे तो वह तुम्हारे हित में ही होगा।” परन्तु आइन्स्टीन की स्वाभाविक जिज्ञासा उनसे अनजाने में ही अध्यापक को ऐसे जटिल प्रश्न पूछने को बाध्य कर देती जिसके उत्तर देने में अध्यापकों को कठिनाई प्रतीत होती शिक्षा का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और अन्त में उनको उनकी इस प्रवृत्ति के कारण अनुशासनहीन मान कर शाला से निष्कासित कर दिया गया। शिक्षा के द्वारा चरित्रवान् , इस शिक्षा-प्रणाली का कोई लाभ राष्ट्रप्रेमी नागरिकों को तैयार  उनको मिला हो ऐसा नहीं कहा जा सकता तो फिर यह शिक्षा प्रणाली आइन्स्टीन जैसे महान् वैज्ञानिक को पैदा करने का श्रेय कैसे ले सकती है ? करना शिक्षा का एक ऐसा दायित्व है जिस पर देश का  भविष्य निर्भर करता है । एक अलबर्ट आइन्स्टीन पैदा कर सकें तो हमारी शिक्षा-  प्रणाली पर किये जाने वाले भारी भरकम व्यय का औचित्य प्रमाणित हो जाता है। हम इसी एक आशा को संजोये इस व्यय का भार उठा रहे हैं।”
यह कैसी विडम्बना है कि जिस एक आइन्स्टीन को पैदा  करन की आशा संजोये इस शिक्षा प्रणाली को महत्त्व प्रदान किया जा रहा है उसी शिक्षा-प्रणाली ने इसी अलबर्ट आइन्स्टीन को ‘अयोग्य’ घोषित कर शाला से निष्कासित करने का अपराध किया था। निष्कासन से कुछ समय पूर्व एक सुयोग्य अध्यापक ने आइन्स्टीन को चेतावनी के रूप कुछ ऐसा ही थॉमस एडीसन के  साथ हुआ। उसे भी उसके अध्यापकों ने अयोग्य घोषित कर दिया क्योंकि शाला के पुस्तकीय ज्ञान में वह कभी भी रुचि नहीं ले सका। अध्यापकों के इस  व्यवहार से क्षुब्ध होकर उसकी माता ने उसे शाला भेजना ही बन्द कर दिया। रवीन्द्रनाथ ठाकुर, आदि अनेक भारतीय  मनीषियों को भी यह शिक्षा पद्धति रास नहीं आई। इन  उदाहरणों से यह प्रमाणित होता है कि आधुनिक शिक्षा- प्रणाली ऐसे असामान्य योग्यता प्राप्त व्यक्तियों के लिए किसी भी दृष्टि से उपयोगी नहीं हुई है। इन महापुरुषों ने  जीवन की इस विस्तृत विद्या-प्रदायिनी शाला के आश्रय में रहकर अपने अनुभवों के आधार पर उस सुप्त प्रतिभा को जागृत करने का और विकसित होने का अवसर दिया जो आगे चल कर उनको विश्व के गौरवमय सिंहासन पर  अभिसिक्त कर सकी। निष्कर्ष यह कि यह शिक्षा-प्रणाली सामान्य लोगों की  सामान्य आकांक्षाओं की पूर्ति का उद्देश्य लेकर चलती है। यह सत्य है कि एक या दो प्रतिशत व्यक्ति ऐसे अवश्य होते  हैं जो अपने अध्यवसाय और कुशाग्र बुद्धि के कारण अपने विषय का सन्तोषजनक ज्ञान प्राप्त करने में सफल हो जाते है। परन्तु वे भी अपन योग्यता का उपयोग धन कमाने में, सम्पन्नता की ओर अधिक से अधिक बढ़ते रहने में करते हैं। यही कारण है कि आज सफल डॉक्टर, कुशल  इन्जीनियर और योग्य प्रशासक तो फिर भी मिल जायेंगे, परन्तु अच्छे मानवों का अभाव ही दिखाई देगा। डॉक्टर अच्छा है परन्तु मानवता के नाते उससे सहायता की अपेक्षा करना नितान्त मूर्खता प्रमाणित होती है और न्यूनाधिक मात्रा में यही दशा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में दिखाई देती है। संवेदन-शून्यता और धन-लिप्सा ने हमारी पाशविक  प्रवृत्तियों को खुली छूट दे रखी है। यह दशा शिक्षा को  रोजगार से, जीविकोपार्जन के साधनों से जोड़ने के कारण हुई है। ऐसा अनेक शिक्षा-शास्त्रियों का भी मत है। अनेक शिक्षा-आयोगों ने भी शिक्षा का एक उद्देश्य  जीविकोपार्जन की योग्यता व क्षमता प्रदान करना ठहराया है। और आज की वास्तविकता यह है कि शिक्षा का एक  मात्र उद्देश्य जीविकोपार्जन के साधन प्राप्त करने के लिए किसी न किसी डिग्री को प्राप्त करना ही हो गया है। विद्यार्थी  विद्या प्राप्त करने नहीं आते, उनमें ज्ञानवर्धन की आकांक्षा नहीं होती, वे आते हैं डिग्री प्राप्त करने के लिए ताकि कोई न कोई नौकरी प्राप्त करने में सफलता प्राप्त हो जाये। परन्तु  होता यह है कि डिग्री प्राप्त करने के पश्चात् वे अपनी डिग्रियां लिये एक सरकारी कार्यालय से दूसरे सरकारी कार्यालय में घूमते दिखाई देते है। पुस्तकीय ज्ञान ने एक ओर उनमें शिक्षित होने का झूठा अहंकार उत्पन्न कर दिया है तो  दूसरी ओर नौकरी के अतिरिक्त किसी अन्य कार्य को कर सकने की उनकी योग्यता को कुण्ठित कर दिया है। कार्य-  कुशलता की यह दशा है कि एक इन्जीनियर मशीन की एक छोटी सी त्रुटि भी ठीक नहीं कर सकता। उसके लिए उसको  एक मिस्त्री की सहायता लेनी पड़ती है। एक कृषि स्नातक  काम करने के लिए खेत पर नहीं जाता और न ही उन्नत कृषि के साधनों के ज्ञान को क्रियारूप में परिणित करता है वह कुर्सी और सुविधाजनक वेतनभोगी सरकारी अधिकारी बनना चाहता है। परिणाम स्वरूप शिक्षित  बेरोजगारों की समस्या विकराल रूप धारण करती जा रही है। इतना ही नहीं, डिग्री प्राप्त करने की उत्कट लालसा में  नीति-अनीति के विचार को भी तिलाञ्जली दे दी गई है। अनुचित साधनों के प्रयोग से डिग्री प्राप्त करने की बात  आज इतनी प्रचलित हो गई है कि आश्चर्य उसकी उपस्थिति से न होकर यदि उसका अभाव कहीं दिखाई दे तभी होता है। जब शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान-प्राप्ति और तदनन्तर ज्ञान-  भण्डार में वृद्धि होना न होकर जीविकोपार्जन के साधन जुटाना हो जाये तब विद्या व ज्ञान की उपेक्षा होना स्वाभाविक ही है। और आज हमारे देश में ठीक यही हो  रहा है। वर्षों पूर्व प्रो. विनायक हरि दाते ने अपनी पुस्तक Prof. R.D. Ranade and his Spiritual lineage में प्रो.  रामचन्द्र दत्तात्रेय रानडे के इस विषय पर जो विचार थे उन्हें इस प्रकार व्यक्त किया है। …. The main  function of a university is neither to manufacture graduates in large numbers nor to make the education job-oriented, but to create facilities for research and to create men of character. काश ! ऐसा हो सकता।
शिक्षा का दूसरा और अत्यन्त महत्त्वपूर्ण उद्देश्य चरित्र  निर्माण है। शिक्षा के द्वारा चरित्रवान्, राष्ट्रप्रेमी नागरिकों  को तैयार करना शिक्षा का एक ऐसा दायित्व है जिस पर देश का भविष्य निर्भर करता है। चरित्र-निर्माण किस प्रकार  किया जा सकता है और उसके लिए क्या क्या प्रयत्न आवश्यक है इन सबका स्पष्ट आकलन किसी भी शिक्षण- संस्था को है भी या नहीं, यह कहना अत्यन्त कठिन है। किसी भी कार्य की उपादेयता उसके द्वारा उत्पादित फल  से ही ऑकी जा सकती है। और इसी उद्देश्य से हम अपने  चारों ओर दृष्टि दौड़ायें तो देश के नव नागरिकों का और पुरानी पीढी के राजनीतिज्ञों का जो चित्र सामने आता है उस सन्तोषजनक कहना बड़े साहस का काम है। नैतिक  गुणों का ह्वास जिस त्वरित गति से हो रहा है और अनैतिक आचरणों को जिस तत्परता से स्वीकृति मिलती जा रही है उसको देखते चरित्र निर्माण की बात करना निरा प्रलाप प्रमाणित होगा। जिस स्वतन्त्रता को जीवन का महत्त्वपूर्ण  उद्देश्य माना जाता है उसका प्रथम सोपान ‘विनय’ और ‘आज्ञापालन’ है, परन्तु इन दोनों के स्थान पर देखने को मिलती है अहंमन्यता, उद्दण्डता और स्वेच्छाचारिता । चरित्र-निर्माण चरित्रवान् व्यक्तियों की देख-रेख में उनके  जीवन से प्रेरणा लेकर तदनुसार कर्म-प्रवृत होने से होता है, परन्तु आज की शिक्षण-संस्थाओं में ऐसे उच्च चरित्र के महानुभावों से सम्पर्क होने की सम्भावना ही क्षीणतम हो चुकी है तो फिर चरित्र निर्माण कैसे हो ? पुस्तकें पढ़कर  या ज्ञान व नीति की बातें सुन कर या कह कर प्रेरणा दी जा सकती है. चरित्र निर्माण नहीं किया जा सकता। इस  महती कार्य के लिए सरकार का मुख देख से कोई लाभ होने वाला नहीं है। यह कार्य स्वयं जनता को अपने प्रयत्नों  से करना होगा। अतएव आज देश को ऐसे नागरिकों की और कुछ ऐसी  संस्थाओं की आवश्यकता है जो इस कार्य का बीड़ा उठा सके। चरित्र निर्माण के अतिरिक्त यह भी अत्यन्त  आवश्यक है कि वर्तमान युग की मांग को पूरा करते हुए अपनी सांस्कृतिक विरासत को अक्षुण्ण रखा जा सके। दूसरे शब्दों मे वैज्ञानिक उपलब्धियों का हमारी सांस्कृतिक  विशेषताओं के साथ ऐसा सामञ्जस्य बिठाया जावे कि देश एक बार फिर जागृत होकर विश्व में अपनी पहचान स्थापित कर सके । यहाँ यह कहना अप्रासंगिक नहीं होगा कि  उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक काल में शिक्षा के क्षेत्र में ऐसे कई प्रयोग किये गये थे जो देश की आवश्यकता और जन-जन की आकांक्षाओं की पूर्ति कर सके। गाँधीजी की ‘बुनियादी  शिक्षा’ आर्य समाज के वैदिक विद्यालय; रवीन्द्रनाथ ठाकुर का ‘शान्ति निकेतन’ आदि कुछ ऐसे ही प्रयोग थे। महत्त्व  उनकी सफलता या असफलता का नहीं है, महत्त्व इस ओर प्रयत्नशील होने का है, लीक से हट कर कुछ नया प्रयोग कर लेने का है। उपलब्धि चाहे कितनी भी महत्त्वपूर्ण  क्यों न हो, उसके लिए किये गए संघर्ष का महत्त्व कम करके नहीं आँका जा सकता। यह संघर्ष जनता को, जनता के  प्रबुद्ध नागरिकों को ही करना पड़ेगा। सरकारी आयोग ऐसे  प्रयोग करने का साहस न तो पहले जुटा पाये थे और न अब जुटा पायेंगे। अतएव देश के प्रबुद्ध नागरिकों को और  ऐसी ही संस्थाओं को यह कार्य करने के लिए आगे आना पड़ेगा। आज भी कुछ संस्थाएं इस दिशा में कार्यरत हैं.  उनको प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है। कार्य कठिन है. परन्तु असम्भव नहीं। दृढ़ इच्छा शक्ति और अदम्य साहस  से असम्भव को भी सम्भव बनाया जा सकता है।

जगन्नाथ व्यास  

बरिष्ठ अध्यापक (से.नि.) भजन चौकी, जोधपुर।