शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसे अपने जीवनकाल में किये गये किसी कर्म के लिए पश्चात्ताप नहीं हुआ हो | जीवन में ऐसे कई अवसर आते हैं, जब एक व्यक्ति अज्ञान से या जानबूझकर, आलस्य के कारण या अपनी हठधर्मिता से, प्रमादवश या अहंकार से प्ररित होकर कुछ ऐसे कार्य कर बैठता है जिसके सको बाद में पछताना पड़ता है | प्रतिदिन की छोटी – मोटी भूलें और उनके कारण होनेवाले पश्चात्ताप पर विशेष विचार करने की आवश्यकता नहीं क्योंकि उन्हें थोड़ी -सी सावधानी और विचार से नियन्त्रित किया जा सकता है | परन्तु जीवन में जब एक प्रकार की क्रान्तिकारी परिवर्तन उत्पन्न करनेवाली भूल हो जाती है तब उसके लिए पश्चात्ताप भी गहरा होता है, क्योंकि उससे व्यक्तिगत अहित तो होता ही है, साथ ही सामाजिक व्यवस्था को भी ठेस लगती है। कैकेयी का ही उदाहरण लें | उसके मन की ईर्ष्या, पुत्र- प्रेम और राज्य प्राप्ति की प्रबल आकांक्षा ने उससे वह कृत्य करवा दिया जिसके परिणामस्वरूप परिवार की सुख-शान्ति, सामंजस्य, एकरसता और पारस्परिक सद्भाव ही नष्ट हो गये | राम, लक्ष्मण और सीता को वनवास के लिए प्रस्थान करना पडा; दशरथ ने उनके वियोग में प्राण त्याग दिये और भरत ने राज्य- सिंहासन स्वीकार करने से स्पष्ट इन्कार कर दिया । इस विभीषिका और अपने उद्देश्य की विफलता ने को अपने कुकृत्य के लिये पश्चात्ताप करने को बाध्य कर दिया | कैकेयी का पश्चात्ताप कहाँ तक खरा था, इसी पर जीवंन की रूपरेखा तैयार होती है । अतः हम खरे और खोटे पश्चात्ताप का अन्तर समझने का प्रयत्न करेंगे |
जीवन के किसी मोड़ पर हम किसी बुरी आदत में फैंस जात हैं और जब उसके दुष्परिणाम प्रकट होने लगते हैं तब हम पश्चात्ताप करते हैं | वे ऐसे लोग होते हैं जो जानते हैं कि वे भूल कर रहे हैं, वे अपनी भूल के दुष्परिणामों से भी परिचित हैं, परन्तु फिर भी उससे छुटकारा नहीं पा सकते | दुर्योधन कहता है- “जानामि धर्म न च मे प्रवृत्ति:, जानाम्यधर्म न च पे निवृत्ति: | केनापि देवेन हृदि स्थितेन, यथा नियुत्तोडस्मि तथा करोमि ॥ वे एक ऐसे मद्यप के समान है जो मदिरापान के कुप्रभावों से परिचित है, मदिरा का प्रभाव समाप्त होने पर उसे पश्चात्ताप भी होता है। उसकी इस जत के कारण परिवार में कलह तथा समाज में अशान्तिं उत्पन्न होती है, परन्तु वह उसे छोड़ नहीं सकता। स्पष्ट ही ऐसा पश्चात्ताप वास्तव में पश्चात्ताप है ही नहीं ।
कभी-कभी पश्चात्ताप इस कारण भी होता है कि हमारे द्वारा किये गये कार्य का परिणाम अत्यन्त भयंकर होने जा रहा है। संसार में भारी अप्रतिष्ठा होने की संभावना संपत्ति-नाश का भय अथवा नाना प्रकार के रोगों का उद्धव हमें ऐसा आतंकित कर देता है कि हमें अपने किये पर आत्म-ग्लानि और लज्जा का अनुभव होता है और हम पछताने लगते हैं। वास्तव में इस प्रकार किया गया पश्चात्ताप परिणामस्वरूप मिलने वाली प्रताड़ना की भाँति से या दण्ड की आशंका से उत्पन्न होता है, न कि अपने द्वारा किये गये कर्म की निन्दनीयता से | अपने द्वारा किये गये अशुभ कर्म के प्रति लगाव वैसा ही बना रहता है और जब भय या आशंका मिट जाती है तो हम फिर वैसा ही कर्म करने में रंचमात्र भी नहीं हिचकिचाते। हम कर्म को बुरा नहीं देखते, दुष्पारिणामों की आशंका ही हमें भयभीत करने लगती है ऐसा पश्चात्ताप भी पश्चात्ताप का खरा रूप नहीं है |
पश्चात्ताप सच्चा वही होता है जिसके कारण हमारे मन में उस कर्म के लिए तितिक्षा ओर घृणा का भाव इतनी तीव्रता से उत्पन्न होता है कि फिर हम उस कर्म की और मुँह तक करने का विचार भी सहन नहीं कर सकते | इस प्रकार के सच्चे पश्चात्ताप से मन का मैल बहकर वह निर्मल हो जाता है, हृदय का विषाद तिरोहित होकर ग़म्भीरता व कोमलता आ जाती है और आचरण की कुटिलता नष्ट होकर उसमें पारदर्शिता का समावेश हो जाता है | इसी कारणा ऋषि-मुंनियों ने, सन्त महात्माओं ने और अन्य महापुरुषों ने पश्चात्ताप को पाप विनाशक और पुण्य-प्रदायक कहा है |
परन्तु हमारी कठिनाई यह हैं कि हमें अपने दौषों का कई बार ज्ञान ही नहीं होता | बाह्य जगत् के लोग हमारे बाह्य आचरण से ही प्रभावित होते हैं और इसीलिए हम अपने बाह्य आचरण को ही सजा-संवार कर जगत के सामने प्रकट करते हैं और समझने लगते हैं कि हम दोष रहित हैं, परन्तु मन के ‘ निविड़ अन्धकार में छिपी कुटिलता स्वार्थपरता और कपट को देखने और पहचानने की सामर्थ्य हम में नहीं है। इसके लिए आत्मज्ञानी साक्षात्कारी सन्त की आवश्यकता है। इसकी कृपा रूपी सूर्य की किरणें जब उस घने अन्धकार को बेधने लगती है तब धोखे और कपट की प्राचीर डगमगाने लगती है, भ्रामक आस्थाएँ और विश्वास चरमराने लगते हैं, कुटिलता और स्वार्थपरता धूलि धूसरित होने लगते हैं और मिथात्व रूपी वृक्ष की जड़ें तक हिल जाती हैं और तब हमको वास्तविक रूप से अपने दोषों का ज्ञान होने लगता है‘ सन्त पॉल के साथ ऐसा ही हुआ था “he samw himself as God saw him, he bowed down in humilitation and confessed his guilt” (The Greatest love; E.Q. White; p.17) तब हमको गुरु की महानता और अपनी अल्पज्ञता का पता चलता है। गुरु के उस उदात्त रूप के सामने हम कितने तुच्छ प्रतीत होते हैं, उसकी पावनता ही हमें अपनी मलिनता का बोध करा देती है। तब हम दण्ड के भय से नहीं अपने दोषों की गुरुता के कारण पश्चात्ताप करते हैं । इसी कारण कर्नाटक के सन्त अम्बुराव महाराज कहते थे कि हम अपने स्वयं के प्रयत्नों से अपने सभी दोष दूर नहीं कर सकते और उसके लिए हमें गुरु की शरण जाना पड़ता है।
इस प्रकार के पश्चात्ताप की तीन प्रमुख विशेषाताएँ हैं | एक तो यह पश्चात्ताप ईश्वर या गुरु की कृपा के अभाव में कम, उत्पन्न ही नहीं हो सकता; दूसरा, यह किसी आशंका, आतंक या भय के परिणाम स्वरूप उत्पन्न नहीं होता: यह उत्पन्न होता है हमारे कर्मों के अशुभत्व का ज्ञान हो जाने से; और तीसरा, इसके परिणामस्वरूप वह व्यक्ति अपने चरित्र को शुभ बनाने के लिए, मन को कोमल और निर्मल बनाने के लिए और ईश्वर दर्शन प्राप्त करने के लिए जो भी दण्ड भोगना पड़े उसके लिए वह पूर्णतया तत्पर रहता है। उसे यह समझ में आ जाता है कि उसे यदि ईश्वर दर्शन प्राप्त करना है, अपने जीवन को स्वर्णसम कान्तिमान बनाना है तो उसे पश्चात्ताप की आग में तपाने से हिचकिचाना नहीं चाहिए |
गुरु की शरण जाकर नाम-दीक्षा लेने के पश्चात् प्रायश्चित की या पश्चात्ताप की आवश्यकता ही नहीं रहती | गुरु ने अपनी कृपा- वर्षा से हमारे पापों का प्रशालन दिया है । अब हमारा कर्त्च्य उनके द्वारा बताये गए मार्ग पर चलकर ईश्वर दर्शन प्राप्त करने के लिए दृढ संकल्प हो जाना है। अब उसे गुरु प्रदत्त नाम का जप और ध्यान करके अपने समय का सदुपयोग करना चाहिए | यदि हम पापोइहं पाकमहिं पापात्मा पापसम्भव:” की ही रट लगाते रहेंगे तो पाप ही हमसे चिपक जाएगा | हम जिसका ध्यान करते हैं उसके अनुरूप बनते जाते है अत: पश्चात्ताप की भावना त्याग कर ईश-चिन्तनै, नाम जप, ध्यान आदि करने से ताप से तो मुक्ति मिलेगी ही, साथ ही ईश्वर दर्शन की सम्भावना भी बढ़ती जायगी और तब ईश्वरीय गुणों से विभूषित का सौभाग्य प्राप्त होगा । प्रो. विनायक हरि दाते के अनुसार “Mediatation on 900 and the consequent grace of 50000 away with the need of repentance for the sins. This 0065 not mean that repentace is not considered as a necessary and useful part of the moral consiousness, it only means that repentance is not the exclusive sign of religious belief. Too much repentance without meditation indicates nothing but weakness and lock of with in God (Yoga of Saints, Page 47) अतएव नैतिक और आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टिकोणों से पश्चात्ताप का इतना महत्त्व नहीं है जितना नामजप और ध्यान का। पश्चात्ताप प्रेरक के रूप में एक अल्प कालावधि तक ही उपयोगी है, उसके पश्चात उससे हानि होने की ही सम्भावना रहती है | इसके विपरीत नाम-जप सदैव हितकारी ही होता है | नामें संकटें नासती, नामें विध्नें निवारती’ नामस्मरणें पाविजेती | उत्तम पदें। (समर्थ गुरू रामदास) अतः पश्चात्ताप छोड़ कर नाम-जप करना ही अधिक उपयुक्त प्रमणित होता है | इसके अतिरिक्त एक और महत्त्वपूर्ण बात का उल्लेख आवश्यक प्रतीत होता है | ईसाई धर्म के अनुसार सम्पूर्ण मानव जाति को आदम द्वारा ईश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करने की भूल के कारण पाप-योनिज माना जाता है और इसीलिए उसके लिए पश्चत्ताप नितान्त आवश्यक है। परन्तु भारतीय विचार-धारा मानव-मात्र को अमृतस्य पुत्रा… समझती है; इसके अनुसार मानव मात्र मूल रूप में ईश्वर ही है अत: उसे
पाप भावना से मुक्ति प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं रहती | वह तो सदैव मुक्त ही है, केवल अज्ञानवश अपने को बद्ध (पापी नहीं) समझता है और इस अज्ञान का परदा दूर करने के लिए ही उसे गुरु की शरण जाने की और साधन-अभ्यास करने की आवश्यकता रहती है। उसके लिए पश्चात्ताप किये बिना ही ईश्वर के राज्य में गुरु-कृपा की सामर्थ्य से प्रवेश करने की सम्भावना बनी रहती है।
सारांश यह कि पश्चात्ताप अनावश्यक नहीं होते हुए भी अपने सामर्थ्य से हमारे नैतिक और आध्यात्मिक जीवन को पुष्ट नहीं बना सकता | इसके विपरीत गुरु-कृपा सम्पादन करना, ईश्वर के नाम का आदर व प्रेम से स्मरण करना और अपने नैतिक आचरण को निर्दोष बनाये रखने से सभी प्रकार से अभ्युदय निश्चयपूर्वक ही होता है ऐसा सभी सन्तों ने कहा है | अतः पश्चात्ताप को अनावश्यक महत्त्व न देकर नामजप और ध्यान द्वारा अपना हित-साधन करना उचित प्रतीत होता है।
– जगन्नाथ व्यास
वरिष्ठ अध्यापक (से. नि.), भजन चौकी, जोधपुर
