क्या वानप्रस्थ संस्था अप्रासंगिक हो गई है?

जीवन एक अनबूझ पहेली है। जगत् की नानारंगी, नानारूपी भंगिमाएँ ही शैशवावस्था में अज्ञान और बाल्यावस्था में जिज्ञासा का रूप धारण कर जीवन को बाँधे रखती है। यौवनावस्था की मादकता उसे भ्रमित करती रहती है और प्रौढ़ावस्था तक पहुँचते-पहुँचते उसकी असारता का आभास मिलने लगता है। परन्तु, वृद्धावस्था में उसकी निष्ठुरता, संवेदनहीनता और स्वार्थपरता अपने व्यक्तियों का ज्ञानाभिमान कितना थोथा और सत्त्वहीन है। परन्तु, उसकी सुनता कौन है? उसे लगता है कि इन सबके पीछे एक ऐसा रहस्य भरा चक्र है जो ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर घुमाता अवश्य है, परन्तु पहुँचाता कहीं भी नहीं है।” यह है हर्ष-शोक, सुख-दुःख, उन्नति- अवनति से चालित मानवजीवन की कथा। जीवन के संध्या काल यानी वृद्धावस्था में पहुँचते-पहुँचते उसे यह प्रतीत होने लगता है कि वह अब तक के जीवन को या तो सम्बन्धों के आकर्षक जिल्दैने बहलाता रहा है या धन-सम्पत्ति; पद-प्रतिष्ठा आदि को ही जीवन के आदर्श रामझने के भ्रम में धोखा खाता रहा है। जब ये खिलौने बिखरकर तितर- बितर हो जाते हैं एवं भ्रम और धोखे पर से जब पर्दा हटने लगता है, तब अब तक व्यतीत किए गये जीवन की निरर्थकता और खोखलापन उसे मर्मान्तक पीड़ा पहुँचाता है। यह नैराश्यपूर्ण तितिक्षासंवित मनोवृत्ति तब जागृत होती है, जब उसको यह प्रतीत होने लगता है कि जीवन में सब कुछ खोकर भी वह प्राप्त कुछ भी नहीं कर सका है। जिन स्वजनों-परिजनों के प्रति उसके ममत्त्व का पार नहीं था, आज वह ममत्व ही उसके लिए सबसे अधिक पीड़ादायक हो गया है। समाज के बदलते परिवेश में, निरन्तर परिवर्तित होते हुए नैतिक मूल्यों में, बढ़ती हुई स्वेच्छाचारिता और अनुशासनहीनता में उसे अपने सारे स्वप्न तिरोहित होते दृष्टिगोचर होते हैं। यही आज के वृद्ध वर्ग की पीड़ा है और उसका उपचार ढूँढ़ने का प्रयत्न समाज और सरकार कर वीभत्स रूप में प्रकट होने लगती है। बालक की जिज्ञासा से युवक को कोई सहानुभूति नहीं; युवक की अल्हड़ और रही है; और यही उनकी भूल है। वृद्धसमाज की पीड़ा को न सरकार दूर कर सकती है और न ही समाज। यह कार्य उन्मुक्त क्रियाएँ प्रौढ़ को विढ़ाती-सी लगती हैं और प्रौढ़ स्वयं वृद्ध को करना पड़ेगा। की अनुभव आधारित उपदेश-वृत्ति युवक को विष से भी अधिक मारक लगती है। वृद्ध को प्रतीत होता है कि यौवन के मद में इठलाना कितना निरर्थक और मूर्खतापूर्ण है; प्रौढ़ (1 ” क्या वृद्धाश्रमों की स्थापना करके एक वृद्ध के उपेक्षित ममत्व पर मरहम लगाया जा सकता है? क्या कुछ सुविधाएँदेकर उसके आहत अहंकार को सान्त्वना दी जा सकती है? वह यह कैसे भूल सकेगा कि वह निराश्रित और असहाय जीवन व्यतीत करने को बाध्य किया जा रहा है? वास्तव में ये सभी उपाय उसे परजीवी या परावलम्बी बनाने में ही सहायक सिद्ध होंगे। अत्यन्त दुर्भाग्य की बात तो यह है कि आज इस देश की मानसिकता में परावलम्बन की वृत्ति घर कर गई है। स्वावलम्बन अर्थात् अपनी सहायता आप करने की भावना का ही लोप हो गया है। आज उसी को जागृत करने की सर्वाधिक आवश्यकता है। अतएव वरिष्ठ नागरिक कहिए या वृद्ध, उसे स्वयं अपने प्रयत्नों से अपनी दुःस्थिति पर विजय प्राप्त करनी पड़ेगी। उसे सबसे पहले यह भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि इसी जीवन को महापुरुषों ने, सन्तों और महात्माओं ने एक अलौकिक आभा से प्रदीप्त किया था। न केवल उनका बल्कि उनके सम्पर्क में आनेवाले, उनके आदर्शों पर चलनेवाले, उनकी आज्ञा का पालन करनेवाले कितने ही व्यक्तियों का जीवन हमें आश्वस्त करता है कि हम अपने जीवन को भी उदात्त और उपयोगी, सुखमय और सुखदायी बना सकते हैं। इस प्रसंग में हम कर्णाटक के महान् सन्त श्री नारायण राव महाराज निंबरगी का अत्यन्त प्रेरक उदाहरण लेते हैं। प्रो. विनायक हरि दाते ने अपनी पुस्तक Prof. R.D. Ranade and his spiritual lineage में उनकी अनासक्ति व निस्पृहता का दिग्दर्शन कराते हुए लिखा है “He did not renounce the world and became a wandering ‘Jangama’, as the Lingayata Sadhu is called. He stayed in the family but only as a stranger or a guest. As his sons became able to manage the house-hold, he handed over that responsibility to them and never again looked into their affairs (p.21) एक वृद्ध इससे प्रेरणा ग्रहण करके अपने जीवन को अर्थपूर्ण मोड़ दे सकता है और इस प्रकार अपने मनस् द्वारा रचित जाल और उसकी पीड़ा से उबरने का प्रयत्न कर सकता है। उसे अपने आपको समझाना चाहिए कि उसने अपने जीवन में वह सब कुछ किया है जिसे वह करना चाहता था या जिसको करने की उसमें योग्यता और क्षमता थी। अपनी योग्यता के अनुसार परिवार की समस्त समस्याओं का, समाधान किया है। अब यही कार्य उसकी सन्तान को करना है। अतः, उसको पारिवारिक उत्तरदायित्वों से मुक्ति प्राप्त कर लेनी चाहिए और अपनी सन्तान को स्वतन्त्रतापूर्वक उनके अपने ढंग से कार्य करने का अवसर प्रदान करना चाहिए। ऐसा करने से उसे अपनी सन्तान का प्रेम और आदर तो प्राप्त होगा ही, वह स्वयं भी पारिवारिक चिन्ताओं से मुक्त हो घर में ही एक वानप्रस्थी की तरह रह सकता है। एक बार इस उत्तरदायित्त्व से मुक्ति पाने के पश्चात् फिर किसी भी रूप में अपने स्वामित्व की भावना का या अहंकारयुक्त बड़प्पन का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। उसे यह याद रखना चाहिए कि एक न एक दिन उसे यह सब कुछ अपनी सन्तान के भरोसे छोड़कर इहलोक से जाना ही पड़ेगा। तो फिर, जो काम कल होने ही वाला है उसको आज करने में हिचकिचाहट क्यों? प्राचीन काल में राजा – महाराजा तक राजपाट अपनी सन्तान को सौंपकर वनवास करते थे, उसके पीछे भी यही भावनां काम करती थी। इससे एक तो वे अपना समय निर्विघ्न रूप से ईश्वर- चिन्तन में लगा सकते थे और दूसरी ओर अपनी सन्तान को स्वतन्त्रतापूर्वक कार्य करने का अवसर दे सकते थे । इसी में वानप्रस्थ आश्रम का महत्त्व निहित है। इसके पश्चात् उसे अपनी मानसिकता में, जीवन के प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन लाना पड़ेगा। मानसिक रूप से स्वामित्व की भावना को तिलांजलि देनी पड़ेगी, ममता की डोर को ढीला करना पड़ेगा और इन दोनों से उत्पन्न अहंकार को शान्त करना पड़ेगा। उसे अपना कर्मक्षेत्र बदलना पड़ेगा। अब तक जिस व्यग्रता से वह परिवार का हित-चिन्तन करता था और जिस तत्परता से वह परिवार के सदस्यों की सुख-सुविधा के लिए प्रयत्नशील रहता था, आज उसी व्यग्रता और तत्परता से सामाजिक कार्यों में, परोपकार के कार्यों में लग जाना चाहिए। यदि वह शिक्षक है तो निर्धन छात्रों को निःशुल्क शिक्षा दे सकता है. डॉक्टर है तो निर्धन लोगों के नाना रोगों का निदान कर उनका स्नह अर्जित कर सकता है। कुछ ऐसी स्वार्थ-रहित सामाजिकहितों के लिए कार्य करनेवाली संस्थाओं से जुड़कर उनके निर्देशानुसार समाजोपयोगी कार्य कर सकता है। 1इस प्रकार वह कर्माभाव से उत्पन्न रिक्तता से छुटकारा पा जायगा। 2एक परिवार के बन्धन से छूटकर असंख्य परिवारों का स्नेह अर्जित कर लेगा और जिस समाज ने उस पर असंख्य उपकार किये हैं उससे उऋण होने का श्रेयस्कर कार्य कर सकेगा। 3आज के वर्णाश्रम का कुछ ऐसा ही रूप होगा। 4प्राचीन काल की वानप्रस्थ व्यवस्था अपने उसी रूप में आज के युग के लिए उपयुक्त नहीं होगी। 5उसमें निहित मूलभाव को इसमें सुरक्षित रखा जा सकता है। 6संसार के प्रति अनावश्यक आसक्ति घर और परिवार के लिए कभी कम न होनेवाला मोह, धन, पद और प्रतिष्ठा प्राप्त करने की अदम्य लालसा को कम करने या छोडने का 7प्रयत्न सेवा और परोपकार के कार्यों द्वारा किया जा सकता है। 8स्वार्थ की परिधि का विस्तार कर परार्थ का समावेश किया जा सकता है। 9आसक्ति का केन्द्र-बिन्दु परिवर्तित कर अपनी आसक्ति ईश्वर में केन्द्रित की जा सकती है। 10निःसन्देह कार्य कठिन है। 11मन पर नियन्त्रण प्राप्त किये बिना ममता और आसक्ति, अधिकार और अभिमान आदि मनोभावों पर विजय प्राप्त नहीं की जा सकती है। 11इसीलिए यह आवश्यक है कि इस व्यवस्था को स्वीकार करनेवाला व्यंक्ति ईश्वर में विश्वास रखे, उसकी कृपा के लिए प्रार्थना करे, उसकी प्राप्ति के लिए ध्यान और नाम-जप पर पर्याप्त समय लगाये। 12ऐसा भाव एक मन्दिर से दूसरे मन्दिर में घूमते रहने से या एक तीर्थ-स्थान से दूसरे तीर्थ-स्थान 13का भ्रमण करने से या आध्यात्मिक ग्रन्थों के पारायण के बाद पारायण करने से प्राप्त नहीं होगा। 14जबतक इन ग्रन्थों में निर्देशित साधन मंमनोयोगपूर्वक नहीं किया जाय या जब तक आचरण की शुद्धता और मन की पवित्रता प्राप्त करने का प्रयत्न नहीं किया जाय, तबतक ये मन्दिर, तीर्थ-स्थान और ग्रन्थ कोई वास्तविक लाभ प्रदान नहीं कर सकते। 15यदि मन की शान्ति प्राप्त करना है, यदि समाजोपयोगी कार्यों से आत्म-सन्तुष्टि प्राप्त करना है तो ईश्वर’ आश्रित होना, 16देव-तुल्य सन्तों की कृपा का सम्पादन करना आवश्यक है। 17अतः प्रातः, मध्याह्न और रात्रिकाल में ईश्वर-चिन्तन, ध्यान और नाम-जप में व्यतीत करना और दिवस का शेष काल परोपकार और लोकहितार्थ कार्यों में लगाना, यही उसकी दिनचर्या होनी चाहिए। 17यदि वह ईश्वर की दयालुता में दृढ़ विश्वास रख कर, अटल निश्चय से इस प्रकार जीवन-यापन करने में असफलता प्राप्त कर सकेगा तो स्वयं उसे ही यह 18अनुभव हो जायगा कि इस दुःखी जगत् में वही एक सुखी है। 19समर्थ स्वामी रामदास द्वारा रचित श्लोक में ‘जगीं सर्वसूखी असाकोण आहे?’ 20पंक्ति का अर्थ बताते हुए दाते महाराज कहते हैं कि ‘सुखी कौन?’ 21इसका तुम विचारपूर्वक शोध करोगे तो तुमको यह समझ में आयगा कि जो परमार्थ मार्ग से भक्तिपूर्वक ईश्वर का आनन्द ले सकता है, वही एक जगत् में सुखी है। 22 (मनोबोध पृष्ठ सं.98) 23अतएव यदि हम वानप्रस्थी बनकर ईश्वरानन्द लेने में और समाजोपयोगी कार्य करने में अपना जीवन लगा देंगे तो अन्य लोगों के लिए जो वृद्धावस्था दुःख का कारण बनती है, वही हमारे लिए सुखमय हो जायगी।

– जगन्नाथ व्यास

बरिष्ठ अध्यापक (से.नि.), भजन चौकी, जोधपुर 24