क्या निर्धनता एक अभिशाप है ?

जीवन कोई खेल नहीं है और न ही यह मनोरंजन के लिए क्रीड़ास्थल है। वह एक कसौटी है जिस पर खरा उतरना एक कठिन कार्य है। इसमें सुख है, दुःख भी है; न्याय है तो अन्याय भी है; पुण्य है तो पाप है; और सम्पन्नता है तो विपन्नता भी। ऐसे ही अन्य द्वन्द्वों से जूझना और उसके परे जाना जीवन का महान आदर्श है। इनके अभाव से जीवन नीरस और ऊब उत्पन्न करनेवाला हो जायेगा। इस दृष्टिकोण से निर्धनता एक अभिशाप है या जीवन की एक आवश्यकता — इस पर विचार करना उचित होगा।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि धन-सम्पत्ति की लालसा मनुष्य मात्र में आदिकाल से है। परन्तु आरम्भ में जिस सम्पत्ति को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए साधन के रूप में अपनाया गया था, वह साध्य बन गई। धनिक होना प्रतिष्ठा का सूचक और अपने-आप में एक गुण बन गया। जैसे-जैसे कुछ लोग धनी होते गए, वैसे-वैसे अधिकांश लोग निर्धन होते गए। यह अन्तर, सम्पन्नता और विपन्नता की यह खाई इतनी चौड़ी हो गई कि उसे पाटना प्रायः असम्भव-सा लगने लगा। निर्धनता को सीमित करने अर्थात् सभी के लिए अन्न-वस्त्र उपलब्ध कराने के जितने प्रयत्न किए गए, वे असफल ही हुए।
अतः कुछ लोगों ने निर्धनता को अभिशाप समझकर उसे निर्मूल करने की घोषणा की, गरीबी मिटाने के संकल्प दोहराए। यह समझा जाने लगा कि यदि सभी लोग धनी और सम्पन्न हो जाएँगे तो जीवन में सुख, सन्तोष और आनन्द का संचार हो जायगा, कोई भी मनुष्य दुःखी नहीं रहेगा। इस दृष्टिकोण में सत्यता का अंश कितना है, इसका विचार करने के पश्चात ही यह निर्णय हो सकता है कि निर्धनता वास्तव में अभिशाप है या नहीं।

इस प्रसंग में एक रोचक तथ्य यह है कि ‘गरीबी हटाओ’ का नारा सम्पन्न और सत्ता-प्राप्त लोगों द्वारा ही प्रचारित और प्रसारित किया जाता है। कहा जाता है कि अमेरिका जैसे सम्पन्न देश में यह विचार पाया जाता है कि ‘या तो धनी बनो या फिर मिट जाओ’ — अर्थात निर्धन लोगों को जीवित रहने का अधिकार नहीं है। निर्धनता के प्रति ऐसा कठोर दृष्टिकोण अहंमन्यता के अतिरिक्त और क्या हो सकता है? गरीबी नहीं मिटती, तो गरीबों को ही मिटा दो — गरीबी स्वतः ही मर जाएगी!

निर्धनता के क्लेशकारी पक्ष पर कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं — वह सर्वविदित है और कुछ अंशों तक सर्वानुभूत भी है। देखना यह है कि क्या निर्धनता का कोई उज्ज्वल पक्ष भी है? क्या वह किसी रूप में मानवता के लिए उपयोगी सिद्ध होती है?
गरीबी पूर्णतया मिटाई जा सकती है — यह बात भी अपने-आप में सन्देहास्पद है। परन्तु एक क्षण के लिए यह मान भी लिया जाए कि निर्धनता को निर्मूल किया जा सकता है, तब भी यह प्रश्न प्रासंगिक होगा कि क्या ऐसा करना उचित होगा?

निस्सन्देह प्रत्येक मनुष्य के लिए उदर-भरण की व्यवस्था, शरीर ढँकने की व्यवस्था और जीवन-धारण के लिए आवश्यक अन्य वस्तुओं की पूर्ति होनी ही चाहिए तथा इनकी प्राप्ति के लिए ही लोग कर्मप्रवृत्त होते हैं, संघर्षरत होते हैं और अपनी शारीरिक एवं मानसिक शक्तियों का प्रयोग करते हैं। यदि ये आवश्यकताएँ अनायास प्राप्त होती रहें तो मनुष्य के निष्क्रिय और अकर्मण्य हो जाने की सम्भावना अधिक रहेगी।
श्रीमन्त लोगों के छोटे-मोटे कार्य करने के लिए सेवक, प्रवास करने के लिए वाहन आदि की उपलब्धि उन्हें शारीरिक कर्मों की उपेक्षा की ओर प्रवृत्त करती है। फलस्वरूप वे नाना रोगों से ग्रसित होते जाते हैं। शारीरिक श्रम की महत्ता कम नहीं आँकी जानी चाहिए।

उसी प्रकार जीवन में संघर्ष अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। मनुष्यमात्र में कुछ गुप्त शक्तियाँ विद्यमान रहती हैं और संघर्ष उन गुप्त शक्तियों को प्रकट करने का महत्त्वपूर्ण कार्य करता है। निर्धनता से उत्पन्न जीवन-संघर्ष व्यक्ति को साहसपूर्वक, आत्मविश्वास से प्रगति के मार्ग पर अविचल भाव से अग्रसर होने का अवसर प्रदान करता है।

यदि हम महापुरुषों के जीवन-चरित्र का अध्ययन करेंगे तो एक आश्चर्यजनक तथ्य सामने आएगा — उनमें से अधिकांश निर्धनता की पीड़ा, अभावों का दंश तथा उपेक्षा और तिरस्कार की प्रताड़ना सहन करने की महानता के उच्च शिखर तक पहुँच सके थे।
कर्नाटक के महान सन्त अम्बुराव महाराज को इमली के पत्ते या नमक के साथ कच्चे बैंगन खाकर समय बिताना पड़ा।
स्वामी विवेकानन्द को विपरीत परिस्थितियों से गुजरना पड़ा। डॉ. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ न जाने कितने समय तक भूखे रहे। प्रेमचन्द आजीविका की खोज में भटके। रामानुजन को क्लर्की करनी पड़ी। टॉमस एडिसन को समाचारपत्र बेचने पड़े।

सारांश यह कि शायद ही कोई महान वैज्ञानिक, दार्शनिक, साहित्यकार या ईश्वरभक्त सन्त होगा जिसने निर्धनता से उत्पन्न वेदना को साहसपूर्वक सहन न किया हो। वास्तविकता तो यह है कि अभावों से जूझने तथा निर्धनता में भी मस्त रहनेवाले ये दृढ़प्रतिज्ञ और साहसी महापुरुष ही जगत को नई दिशा देने में सफल हुए हैं। महानता और मानवोचित गुणों के पोषण में निर्धनता का योगदान कम नहीं है।

यह सामान्य अनुभव है कि जहाँ गरीबों में सहयोग और परस्पर मदद की प्रवृत्ति पाई जाती है, वहीं धनी लोग एक-दूसरे से ईर्ष्या और द्वेष को मन में छिपाए औपचारिक सभ्यता का प्रदर्शन करते देखे जाते हैं। भूखे की पीड़ा को समझकर निर्धन के मन में जो सहानुभूति जागती है, वह किसी भी सम्पन्न व्यक्ति में मिलना अपवाद ही होगा।
धनी व्यक्ति यदि कभी निर्धन की सहायता करता भी है, तो उसमें या तो तिरस्कार का भाव होता है या उपहास परिलक्षित होता है। प्रेम और सहानुभूति के लिए उसके हृदय में शायद ही स्थान होता है। निर्धन व्यक्ति तो सड़क पर कुत्तों तक के लिए प्रेम और अपनत्व दिखा देता है।

निर्धन के परिवार में जो सहयोग, सद्भावना और सहनशीलता होती है, उसका मूल्य उस धनी परिवार से कहीं अधिक है जहाँ विलासिता के साथ-साथ अहंकार और उदासीनता का वास होता है।

सामाजिक परिवेश में जब निर्धनता को समाप्त करने के झूठे आश्वासन दिए जाते हैं, तो पहले तो गरीबों में झूठी आशा जागती है, फिर आशा टूटने पर आक्रोश, असन्तोष और अशान्ति का प्रदर्शन प्रारम्भ हो जाता है।

इसके विपरीत यदि मृत्यु की भाँति निर्धनता को भी अटल मान लिया जाए और विश्वास किया जाए कि सृष्टि में शुभ और अशुभ दोनों का अपना स्थान है, तो निर्धनता को भी स्वीकार किया जा सकता है। जैसे मृत्यु अटल है, पर उसका भय मिटाया जा सकता है — उसी प्रकार निर्धनता भी यदि मिटाई नहीं जा सकती, तो उसकी पीड़ा पर विजय प्राप्त की जा सकती है।

अम्बुराव महाराज कहा करते थे —“श्रीमन्त भी दो रोटी खाता है और निर्धन भी दो ही रोटी खाता है। दोनों भूल जाते हैं कि सुख या दुःख का कारण सम्पन्नता या विपन्नता नहीं — वह कल्पना है जो एक में अहंकार और दूसरे में निराशा उत्पन्न करती है।”

यदि इस कल्पना का नाश हो जाए, तो निर्धनता का दंश पीड़ादायक नहीं रहेगा। तब यह भी समझ में आएगा कि यदि किसी वस्तु को मिटाना ही है, तो वह विलासिता होनी चाहिए — न कि मानवोचित गुणों का पोषण करनेवाली निर्धनता।

— जगन्नाथ व्यास
वरिष्ठ अध्यापक (से.नि.),
भजन चौकी, जोधपुर