आध्यात्मिकता : आज की आवश्यकता

 एक बालक के पाँव की ठोकर एक ग्लास को लग गई। यह देखकर उसके पिता ने कहा- ‘अन्धे हो क्या? ऐसे ग्लास को ठोकर मारते हुए कैसे चलते हो ?” लड़के का सिर झुक गया। कुछ ही दिन बाद संयोग कुछ ऐसा हुआ की उसके पिता के पाँव से भी एक ग्लास को ठोकर लग गई। पिता झुंझलाकर बोले- ‘घर में तुम इतने लोग क्या करते हो ? क्या एक ग्लास भी उचित स्थान पर नहीं रख सकते हो ?” 

यह साधारण-सी घटना है, प्रत्येक घर में घटित होती देखी जा सकती है। कोई इन पर विशेष ध्यान नहीं देता। परंतु, बालक के मन में होनेवाली प्रतिक्रिया अत्यंत महत्वपूर्ण है। वह मन ही मन सोचने लगा है – ‘मेरी ठोकर ग्लास को लगे तो मेरी भूल है ही, परंतु पिताजी की ठोकर उन्हे तब भी भूल अन्य लोगों की, पिताजी की नहीं, ऐसा क्यों ? ‘आचरण के सम्बन्ध में यह दोहरा मापदण्ड उसके मन में न जाने कितने प्रश्न उत्पन्न करता है ? यह कठिनाई एक बालक की या एक परिवार की ही नहीं है, यह तो हमारी सामाजिक व्यवस्था में फैला हुआ एक ऐसा दोष है, जिसने कपटाचरण, मिथ्यात्व और आडम्बर को पालित और पोषित किया है। यह दोहरा मापदण्ड ही हमारे परिवार और समाज की, देश और राष्ट्र की अनेकों समस्याओं का मूल कारण है। पद, अधिकार, सत्ता, धन आदि से सम्पन्न लोग जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में इसी दोहरे मापदण्ड की आड़ में दूसरों को दोषी और अपने-आप को निर्दोष प्रमाणित करते रहते हैं, दोष को निर्दोषिता में बदलना, अन्याय को न्याय के रूप में प्रकट करना, असत्य को सत्य प्रमाणित कर दिखाना एक ऐसा आकर्षक और लुभावना छलावा है जिससे त्राण पाना कठिन होता जा रहा है। परिणामस्वरूप समाज में अपराधियों की संख्या में निरन्तर वृद्धि होती जा रही है और निरपराधी सन्तप्त और दुःखी बनते जा रहे हैं। जिस समाज में शुभ कार्यों के लिए प्रोत्साहन और पुरस्कार नहीं तथा दुष्कर्मों के लिए प्रताड़ना और दण्ड नहीं, उस समाज में अव्यवस्था एवं अराजकता फैलती दिखाई दे तो आश्चर्य ही क्या? इस स्थिति में परिवर्तन कैसे लाया जाए? यही आज के प्रबुद्ध मानव की पीड़ा है; समाज में फैलते हुए असन्तोष को, निराशा और पलायन की वृत्ति को कैसे नियंत्रित किया जाए, यही जागरूक नागरिकों की व्यथा है। 

इस दु:स्थिति तक पहुँचाने के अनेकों अनेक कारणों में से एक कारण वैज्ञानिक प्रगति और भौतिक दौड़ है। नि:सन्देह वैज्ञानिक आविष्कारों ने मानव-जीवन को नाना प्रकार से सुखी, समृद्ध, निरोगी और दीर्घायु बनाया है, परन्तु उसका क्षेत्र भौतिक जगत होने से यह सुख, समृद्धि, आरोग्य सभी देह से सम्बद्ध है। उसको इससे आगे जाकर सोचने की आवश्यकता ही प्रतीत नहीं होती। ईश्वर, आत्मन् और अन्य दिव्य सत्ता का निषेध या उपेक्षा आज की बौद्धिकता का भूषण बन गया है। श्री अरविन्द घोषे ने बुद्धि को दुशरी तलवार (Doubly-Edged Sword) कहा है जो दोनों ओर से काटती है (It Cuts both ways)। आज के मानव ने बौद्धिकता के मद में आध्यात्मिकता की जो उपेक्षा की है, उसी का यह परिणाम है कि एक मनुष्य नाना प्रकार से सुख-साधनों से घिरा होने पर भी असन्तुष्ट है, जीवन में एक रिक्तता या खोखलेपन का अनुभव करता है। अतःअब आज के युग की प्रथम आवश्यकता आध्यात्मिकता की ओर बढ़ने की है; शरीर, मन और बुद्धि की शक्तियों का सही प्रयोग करते हुए हमारे अन्दर जो एक दिव्य-शक्ति है, उसे पहचानने की है। तब ही हम नैतिक दृष्टि से सुदृढ़ मानसिक रूप से संतुलित शारीरिक दृष्टि से सक्षम बन सकेंगे। ऐसे महापुरुष ही अपनी आत्मिक शक्ति से ऐसा वातावरण निर्माण कर सकेंगे, जिसमें एक व्यक्ति स्वतः ही उच्च आदर्शों के प्रति आकर्षित होकर अपने जीवन को उन्नत बनाने का प्रयत्न करने लगेगा। 

उनीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक चरणों में हमारे देश में ही ऐसे ज्योतिम्य शक्तिपुरुषों का उदय हुआ, जिन्होने निराशा के गहरे गर्त में डूबे भारतवासियों को पुनः जागृत कर दिया। रामकृष्ण परमंस और विवेकानन्द गुरुदेव रामचन्द्र दत्तात्रेय रानडे, श्री अरविन्द घोष, रमण महर्षि इत्यादि ने आध्यात्मिकता की जो ज्योति प्रज्वलित की, उसका दिव्य प्रकाश सारे देश को प्रकाशित करने लगा। राजा राम मोहनराय, दयानन्द सरस्वती, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, सी. वी. रमन आदि के प्रयत्न से सांस्कृतिक, साहित्यिक, वैज्ञानिक और राजनीतिक क्षेत्रों में एक सर्वथा नवीन आलोक विकीर्ण होने लगा। फलस्वरूप इस काल में पूरे देश में त्याग और तपस्या, राष्ट्र-प्रेम और बलिदान की एक ऐसी लहर चल पड़ी, जिसने देश का कायाकल्प ही कर दिया। गाँधीजी, विनोबा भावे, बाल गंगाधर तिलक, सुभाषचन्द्र बोस इत्यादि उस काल की ऐसी देन है जिस पर देश सदा गर्व करता रहेगा। आज फिर से ज्योतिपुत्रों की, उनके द्वारा निर्मित अलौकिक वातावरण की आवश्यकता को समझने की और उसके लिए कट्टर परिश्रम करने की आवश्यकता है। 

दूसरी मुख्य बात जो ध्यान में रखना आवश्यक है, वह यह है कि अच्छे समाज का निर्माण अच्छे व्यक्तियों के निर्माण से ही सम्भव है। व्यक्ति ही समाज को सजीव और क्रियाशील बनाता है तथा उसके आचरण के अनुसार समाज उन्नति या अवनति की ओर अग्रसर होता है। केवल नियमों को बदलने से या नये-नये नियमों को बनाने से समाज को बदलने की मानसिकता, भ्रामक और त्रुटिपूर्ण है, इसका अनुभव आज हमें पग-पग पर हो रहा है। अलमारियाँ भरी पड़ी हैं, परन्तु उनसे कोई सुधार हुआ हो, ऐसा नहीं लगता। एक तो इन नियमों की अनुपालन पर ही विशेष ध्यान नहीं दिया जाता है और दूसरी और जितने नियम बनते हैं, उनसे कहीं अधिक उनका तोड़ने के तरीकों का आविष्कार कर लिया जाता है। यह कार्य सरकार या सरकार द्वारा बनाये गए क़ानूनों से न पहले कभी हुआ है और न अब कभी होगा। इसके लिए हमें ऐसे निःस्वार्थ, कर्मठ और सहिष्णुता-सम्पन्न लोगों की आवश्यकता है जो अपने व्यक्तिगत उच्चादर्श से अन्य लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर उनको अपनी जीवन-धारा परिवर्तित करने के लिए प्रेरित कर सकें। समाज में ऐसे व्यक्ति जितना अधिक होंगे, वांतावरण उतना ही निर्मल और प्रेरक सिद्ध होगा। तभी समाज में ऐसे व्यक्तियों का बाहुल्य होगा, जो छल-कपट और मिथ्याचार से ऊपर उठकर सत्य और शुभाचरण का मार्ग अपना सकेंगे; जिनमें एक ओर ईश्वर के प्रति आस्था और भक्ति होगी तो दूसरी ओर वे नैतिक गुणों से समृद्ध होंगे। प्रो. विनायक हरि दाते ने इसी आशय का ध्यान में रखते हुए नैतिकता और आध्यात्मिकता का मिलन-बिन्दु व्यक्ति को बताया है। नैतिकता का महत्व न केवल सामाजिक दृष्टि से है बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से भी उसका महत्व उतना ही है। ‘The moral life is, therefore, doubly valuable; Valuable as a positive asset for the well-being of the society, and Valuable as the backbone and the pointer of the spiritual life.’ 

– (Yoga of the Saints : page 86) 

अब यह पूछा जा सकता है कि ऐसे लोग हमें मिलेंगे कहाँ ? हमें यह मानकर चलना पड़ेगा की आज भी देश में ऐसे लोगों का सर्वथा अभाव नहीं है। हमने जिन ज्योतिम्य:शक्तिपुरुषों का पूर्व में उल्लेख किया है उनके पद-चिह्नों पर चलनेवाले, उनके आदेश और उपदेश के अनुसार आचरण करनेवाले और उनके द्वारा प्रज्वलित ज्योति के प्रकाश का विकिरण करनेवाले ऐसे महापुरुष आज भी हमारे बीच उपस्थित हैं। आवश्यकता है उनके साथ जुड़ने की, उनके आदर्शों में विश्वास करने की और तदनुसार अपने आचरण में परिवर्तन लाने की। प्रयत्न श्रम-साध्य है, परन्तु उसका फल भी उतना ही मीठा और स्वास्थ्यवर्धक है। इस प्रकार एक के बाद एक के जुझे रहने से लोक-शिक्षण और लोक-संग्रह का कार्य गति पकड़ सकेगा। उनके माध्यम से जो परिवर्तन होगा, वह स्थायी और सशक्त होगा। इसमें समय अधिक लगने का आभास कोई कर सकता है, परन्तु ऐसे गुह्यतर कार्य के लिए समय लगाना समय का सदुपयोग ही होगा। मानव-स्वभाव बदलना सरल कार्य नहीं है, देह और देह-सुखों के प्रति आसक्ति छुडाना या कर्म करना कोई बच्चों का खेल नहीं है। यह न केवल समय ही अधिक लगेगा बल्कि कठिनाइयाँ भी अधिक होंगी, परन्तु धैर्यपूर्वक (साहस के साथ) अपना कार्य करते जाना और उसका परिणाम या फल ईश्वरइच्छा पर छोड़ते जाना ही ऐसे कार्यों को सम्पन्न करने की विधि है। परन्तु, हमें यह भी विश्वास होना चाहिए कि यह चिनगारी ? कब बृहदाकार अग्नि का रूप धारण कर लेगी यह कह तो कोई नहीं सकता, परन्तु एक दिन ऐसा होगा अवश्य। इसी विश्वास के साथ अपने सीमित क्षेत्र में हम जो कुछ कर सकते हैं, उसे दृढ़तापूर्वक करते रहना चाहिए। इसी में हमारे जीवन की सार्थकता है। 

सारांश यह कि यदि हमें कपट, छल-छिद्र और पर-दोष-दर्शन जैसे दुर्गुणों से मुक्ति पाकर मन की शुचिता और ह्रदय की सरलता प्राप्त करने की आकांक्षा है तो आध्यात्मिकता और नैतिकता का आश्रय लेना ही पड़ेगा। आध्यात्मिकता का आशय विभिन्न धर्मों में प्रचलित अनुष्ठान, कर्मकाण्ड अथवा रूढ़ियों से नहीं है, उससे तात्पर्य उस परमसत्ता – आत्मन् के अनुसंधान से है जिसका उपदेश भगवान कृष्ण ने अर्जुन को दिया था और विश्व के सभी सन्त अपने शिष्यों का करते आ रहे हैं। ईश्वर पर आश्रित होना, उसमें आस्था और विश्वास रखना एक ऐसा सशक्त संबल है जो हमें जीवन की नानाविध कठिनाइयों का साहसपूर्वक सामना करने की शक्ति और धैर्य प्रदान करता है। गीता में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को कहा: 

मच्चितः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।

अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥ 

“अर्थात् अपना मन मुझ में लगाकर, मेरे प्रसाद से, तुम सभी दुर्गुणों पर विजय प्राप्त कर सकोगे; परन्तु यदि अहंकारवश मेरी बात पर ध्यान नहीं दोगे तो निश्चित रूप से विनाश को प्राप्त होओगे।” दुर्गुणों पर विजय प्राप्त करने का यही एक मार्ग है। समाज को स्वस्थ-सद्गुणी बनाने का यही एक उपाय है। 

जगन्नाथ व्यास 
वरिष्ठ अध्यापक (से.नि.) भजन चौकी, जोधपुर।