जन्मतिथि पर विशेष :
योगीराज अरविन्द : व्यक्तित्व और कृतित्व
महान कार्य का पूर्वाभास :
‘’नारायण, तुम अकेले इस प्रकार गम्भीर मुद्रा में बैठे क्या सोच रहे हो?’’ माता ने पूछा। बालक ने उत्तर दिया, ‘’माता, मैं विश्व की चिन्ता करता हूँ।’’ माता ने इस उत्तर का क्या अर्थ लगाया हम नहीं जानते, परन्तु इस कथन से एक बात स्पष्ट हो जाती है कि आगे चलकर गुरु रामदास के नाम से प्रसिद्ध प्राप्त करने वाला बालक नारायण की अपनी बाल्यावस्था में ही अपने जीवन के उस महान उद्देश्य का आभास था जिसकी पूर्ति के लिए वे इस भारत-भूमि पर आये थे। ठीक इसी प्रकार श्री अरविन्द को भी अपने जीवन के उस महती उद्देश्य का ज्ञान था जिसको सम्पन्न करने के लिए उनका जन्म हुआ था। उन्होंने अपनी पत्नी को एक पत्र में लिखा –
‘’मैं जानता हूँ कि इस पतित जाति का उत्थान करने की शक्ति मुझमें है … यह विचार मेरे साथ मेरे जन्म से ही है … ईश्वर ने मुझे इस पृथ्वी तल पर इस महान कार्य को संपादन करने के लिए ही भेजा है। मेरी चौदह वर्ष की आयु में ही इस विचार-बीज में अंकुर फुटने लग गया था और अठारह वर्ष की आयु तक इसकी जड़ें ऐसी सुदृढ़ हो गईं कि इसे अब हिलाया तक नहीं जा सकता।”
“दोनों ही महापुरुषों को अपने महान कार्य का पूर्वाभास था और इस उद्देश्य ने उनके समस्त भावी कार्य-कलापों को स्पृशालित व अनुप्राणित किया। जिस प्रकार रामदास ने पराजित, हतोत्साहित और निष्क्रिय बनी हिंदूजाति में नवीन प्राण फूंके, एक नया उत्साह जागृत किया और एक नवीन प्रेरणा से उसको अभिसिक्त किया वैसे ही श्री अरविन्द ने अंग्रेजी राज्य में अंग्रेजियत से प्रभावित कायर, स्वार्थी सुविधाभोगी, दुनियादारी में कुशल भारतीयों को स्वतन्त्रता और स्वावलम्बन का, आत्म-सम्मान और आत्म-जागृति का एक नवीन संदेश दिया और दूसरी ओर विकास की श्रृंखला में अन्तिम समझे जाने वाले मानव को ‘अतिमानव’ के रूप में विकसित होने का पुनीत संदेश दिया।
राजनीति एवं योग का सम्बन्ध :
श्री अरविन्द का व्यक्तित्व वैविध्यतापूर्ण था। वे एक सहृदय कवि, जगत और मानव के भावी रूप के स्वप्नदृष्टा, उग्र राजनीतिक विचारक व कार्यकर्ता, गहन चिन्तन के धनी दार्शनिक और एक महान योगी और सन्त थे। अतएव उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर विचार करते समय इसमें से किसी भी एक पक्ष को अन्य पक्षों से अधिक महत्व दिया जाता रहा है। हम उनके कृतित्व के प्रेरक और संचालक दो उद्देश्यों को दृष्टि में रखकर यह जानने का प्रयत्न करेंगे कि वे इन दोनों में समन्वय स्थापित करने में कहां तक सफल हुए थे। उनका पहला उद्देश्य था राजनीतिक कार्यों द्वारा भारत माता का पुनर्जागरण और पुनर्निर्माण करना। दूसरा उद्देश्य था योग-साधना द्वारा उस चिरन्तन सत्य से साक्षात्कार प्राप्त करना जो इन्हें इन कार्यों में गति प्रदान करता है। इन दो परस्पर विरोधी उद्देश्यों में समन्वय स्थापित करना कठिन कार्य था। राजनीतिक क्षेत्र में अथक कार्य करने की आवश्यकता थी तो योग साधना में नितान्त एकांतवास की। परन्तु श्री अरविन्द योग-साधना द्वारा ऐसी आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त करना चाहते थे जिसकी सहायता से राजनीतिक व जीवन के अन्य क्षेत्रों में प्रभुत्व-प्राप्त आसुरी शक्तियों को पराजित किया जा सके और इस प्रकार भारत-माता की मुक्ति का महान कार्य सम्पादित हो सके। उनके इन दो उद्देश्यों का यही समन्वय बिन्दु था। इसमें उनको कितनी सफलता मिली यही इस लेख के अन्वेषण का विषय है।
“वे कार्यकर्ता जो केन्द्र का दर्शन जीते हैं, अर्थात् अपने जीवन के माध्यम से केन्द्र के लक्ष्यों पर अधिक सरलता से प्रकाश डाल सकते हैं हमें ऐसे गुणी कार्यकर्ताओं की बड़ी संख्या में आवश्यकता है।”
बाल्यकाल
श्री अरविन्द का जन्म 15 अगस्त, 1872 को हुआ था। सात साल की अल्पायु में ही उन्हें इंग्लैण्ड विद्या अध्ययन के लिए भेज दिया गया। वहां वे पूरे चौदह वर्ष रहे और प्रमुख यूरोपीय भाषाओं के अतिरिक्त ग्रीक और लेटिन भाषाओं का भी ज्ञान प्राप्त किया। इस प्रकार उनके जीवन के ये प्रारम्भिक वर्ष विदेशी परिवेश में, विदेशी सभ्यता और संस्कृति से अनुप्राणित समाज में रह कर बिताये गये। अतएव यदि वे अनेकानेक अन्य भारतीयों की भांति पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति के प्रशंसक और पोषक हो जाते तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होती। आश्चर्य की बात तो यह है कि संग्रहऔर भोग-प्रधान पाश्चात्य सभ्यता के स्थान पर त्याग और तपस्या की भारतीय संस्कृति से आकर्षित और प्रभावित हुए।
अध्यापन काल
इंग्लैण्ड से लौटने के पश्चात् अर्थात् 1893 के पश्चात् उन्होंने बड़ौदा कॉलेज में अध्यापन-कार्य करना शुरू किया। उस अवधि में ही उनको भारत की दीन-हीन दशा का प्रत्यक्ष ज्ञान हुआ। उनके विचारक मन ने भारत की दुर्दशा के कारणों की खोज प्रारम्भ की, उसके पास क्या है और क्या नहीं है इसका विश्लेषण व विवेचन किया और वे अन्त में इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि भारतवासियों ने ‘शक्ति’ की उपेक्षा की और इसलिए उनका ज्ञान पंगु और भक्ति निरा भावुकता बन कर रह गई। आज भारत को शक्ति की आवश्यकता है – वह शक्ति जो ज्ञान की सार्थकता प्रदान कर सके, वह शक्ति जो भक्ति को वीरोचित जीवनोत्सर्ग के लिए कटिबद्ध कर सके। वे जिस शक्ति की आराधना चाहते थे वह मात्र शारीरिक न होकर, मानसिक और और नैतिक भी थी इस सबके स्रोत के रूप में आध्यात्मिक प्रधान थी। ‘द मदर’ उनका एक छोटा किन्तु महत्वपूर्ण ग्रन्थ है और उसमें शक्ति महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती और महेश्वरी इन चार रूपों में प्रकट हुई है। ये क्रमशः युद्ध की शक्ति, धन की शक्ति और विज्ञान की शक्ति के रूप हैं वहीं महेश्वरी आदि शक्ति, चिरन्तन शक्ति के रूप में स्थित हैं। ये शक्ति, नाना रूपेण शक्ति श्री अरविन्द को उनके राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति में ही सहायक होने वाली नहीं थी, वह योग-साधना के प्रयत्नों को भी सार्थकता प्रदान करने वाली थी।
कार्य क्षेत्र का विस्तार
परिणाम स्वरूप श्री अरविन्द ने राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय भाग लिया। मातृ-शक्ति को जागृत और क्रियाशील बनाने के लिए कई लेख, कविताएं और काव्य-ग्रन्थ लिखे और तत्कालीन प्रसिद्ध राजनीतिक नेताओं से भेंट भी की। वे तत्कालीन नेताओं की ढुल-मुल नीति से असन्तुष्ट व दुःखी हो गये और उनका झुकाव क्रान्तिकारी योजनाओं की ओर अधिकाधिक होने लगा। उनकी प्रेरणा और प्रोत्साहन से गोपनीय ढंग से काम करने वाली असंख्य क्रान्तिकारी संस्थाओं का जन्म हुआ। तभी बंगाल-विभाजन की विभीषिका ने पूरे देश को और मुख्य रूप से बंगाल को झकझोर दिया। की अरविन्द इस अवसर को कैसे खो सकते थे? अब तक उनका कार्य-क्षेत्र बड़ौदा था, अब वे कलकत्ता लौट आये और वहाँ क्रान्ति की ऐसी ज्योति जगाई कि एक बारगी राज्य-सत्ता भी कंपायमान हो गई। उन्हें गिरफ्तार किया गया और अलीपुर जेल की एकांत कोठरी में रखा गया। उन पर मुकदमा चला परन्तु पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में अन्त में उन्हें मुक्त कर देना पड़ा।
जगन्नाथ व्यास
