मनबोधक श्लोक

॥ श्रीराम ॥

॥ श्री सद्गुरु प्रसन्न ॥

आमुख्य समर्थ श्रीरामदास महाराज द्वारा रचित “श्रीमनाचे इलोक‘ नामक पुस्तक में मन को सम्बोधित करके 205 श्लोक मराठी भाषा में लिखे गये हैं जिनमें आध्यात्मिक जगत्‌ के गुह्मातम तथ्यों का अभूतपूर्व विवेचन किया गया है। इस रचना में एक ओर वेदों और उपनिषदों के “सार तत्व’ परब्रह्म की प्राप्ति के लिए सुगम “भक्ति-पथ” का उत्तम निरूपण किया गया है तो दूसरी ओर नीतियुक्त पवित्र पारमार्थिक जीवन की प्रेरणा दी गईं है तथा तीसरी ओर परमेश्वर के सगुण स्वरूप की गरिमा अक्षुण्ण रखते हुए निर्गुण ब्रह्म का महत्व प्रतिपादित किया गया है तो चौथी ओर सदगुरु एवं संतो के लक्षणों का सूक्ष्म विश्लेषण भी किया गया है। पारमार्थिक अनुभव-जगत्‌ के अपार सिन्धु को श्लोकरूपी सूक्ष्म बिन्दुओं में समाहित करने का असंभव कार्य समर्थ श्रीरामदास महाराज के अलावा और कौन कर सकता है जो महात्मा कबीर के शब्दों में चिन्तनीय है -“समन्द समाना बूँद में सो कत हेरा जाय।”

ऐसे गूढ़ “मनाचे श्लोकों’ का भावपूर्ण पद्यानुवाद करना भी कठिन चुनौती से कम नहीं है। किसी पद्य रचना का अन्य भाषा में गद्यानुवाद करना शब्द-सीमा की पाबन्दी से सदैव मुक्त होता है जबकि पद्यानुवाद में ऐसी स्वतंत्रता बिलकुल नहीं होती है। इसीलिए किसी पद्य-रचना का उसमें निहित भावों को ज्यों का त्यों जीवन्त रखते हुए अन्य भाषा में पद्यानुवाद करना विद्वता की कड़ी कसौटी माना जाता है। यदि वह पद्य-रचना आध्यात्मिक हो तो यह चुनौती और भी दुष्कर हो जाती है क्योंकि फिर इसके लिए केवल विद्वता और पाण्डित्य ही पर्याप्त नहीं हैं वरन् कठोर भक्ति-साधना-जनित अनुभवपरक विवेक भी निहायत जरूरी होता है। ये दोनों ही विलक्षण-विशिष्टताएं परम श्रद्धेय स्व. श्रीमान् जगन्नाथ जी व्यास के अनूठे व्यक्तित्व में निहित थीं जिन्हें समीपता से देखने एवं समझने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ था। श्रीमान्‌ जगन्नाथ जी व्यास हिन्दी और अंग्रेजी भाषा के अच्छे विद्वान थे। मराठी भाषा का ज्ञान उनको दर्शनशास्त्र के प्रख्यात प्रोफेसर ( डॉ. ) विनायक हरि दाते साहब के दीर्घकालीन सम्पर्क से ही प्राप्त हुआ था। वे प्रोफेसर साहब के सम्पर्क में 1956 में दर्शनशास्त्र के विद्यार्थी के रूप में आये। इतना ही नहीं वे श्री दाते महाराज के आध्यात्मिक सच्छिष्य के रूप में भी घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए थे। मराठी भाषा में लिखित महाराष्ट्रीय सनतों के पारमार्थिक ग्रन्थों का श्री दाते महाराज के साहचर्य में सतत स्वाध्याय करने से श्रीमान्‌ जगन्नाथ जी व्यास को मराठी भाषा का भी अच्छा ज्ञान हो गया था। श्री दाते महाराज ने समर्थ श्रीरामदास के ‘मनाचे-श्लोकों’ का “मनोबोध” शीर्षक रचना में परमार्थ-पिपासुओं के लिए हिन्दी भाषा में उत्तम गद्यानुवाद किया है। उसी को हृदयंगम करके और वहीं से प्रेरणा लेकर श्रीमान्‌ जगन्नाथ जी व्यास ने ‘मनाचे-श्लोकों’ का हिन्दी में प्रभावशाली पद्यानुवाद करने का निश्चय किया था। 

श्रीमान्‌ जगन्नाथ जी व्यास को श्री दाते महाराज के साथ एक ओर ज्ञान एवं दर्शन में दीर्घकाल तक रचने-पचने का अनुपम अवसर मिला था तो दूसरी ओर सदगुरु समर्थ श्री दाते महाराज के संग लगभग 30 वर्षों तक भक्ति-साधना की प्रखर-अग्नि में तपने का अलभ्य लाभ भी प्राप्त हुआ था। अतएव श्रीमान्‌ जगन्नाथ जी व्यास न केवल मूर्धन्य विद्वान्‌ ही थे वरन्‌ एक श्रेष्ठ सन्त भी थे। उनके सन्त-स्वरूप को बहुत ही कम लोग जान पाए क्योंकि वे अपने सन्त-स्वरूप से यवनिका हटने ही नहीं देते थे। उनका पारमार्थिक-चिन्तन पूर्णरूपेण अनुभवगम्य ही था इसीलिए समर्थ स्वामी रामदास के ‘मनाचे-श्लोकों’ का भावपूर्ण जीवन्त पद्यानुवाद करने में वे सफल हुए। इस पद्यानुवाद में श्लोकों के गूढ़ आध्यात्मिक भाव ज्यों के त्यों प्रभावी ढंग से निरूपित हुए हैं। यही इस पद्यानुवाद की स्तुत्य विचक्षणता है। 

इस पद्यानुवाद में हिन्दी की कोमल-कान्त पदावली की नव्यता, आरोह-अवरोह की भव्यता, गूढ़ भावों की बोधगम्यता और लय-बद्धता की रम्यता अद्वितीय है। इसका शब्द-लालित्य, भाव-गाम्भीर्य एवं काव्य-माधुर्य एक अछूता आदर्श है। काव्य के तीनों गुण ओज, माधुर्य और प्रसाद इसमें सहज दर्शनीय हैं। इसकी शैली की मनोहरता ने काव्य सौन्दर्य को और भी मनोरम बना दिया है। इस पद्यानुवाद में मूल-ग्रन्थ के पारमार्थिक गूढ़ तत्व सुबोध एवं सुग्राह्न हैं जिससे हिन्दी भाषा जिज्ञासुओं के लिए अलभ्य परमार्थ सहज लभ्य होगा, ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है।

डॉ. फूल सिंह देवड़ा,

सेवा-निवृत्त उप प्राचार्य,

जिला शिक्षा एवम्‌ प्रशिक्षण संस्थान,

जिला पाली (राज)