श्री जगन्नाथ व्यास
॥ श्रीराम ॥
॥ श्री सद्गुरु प्रसन्न ॥
स्वयं माताजी ने श्री जगन्नाथ जी व्यास का परिचय इन शब्दों में अत्यंत उत्कृष्ट रूप से देने की कृपा की है –
“श्री जगन्नाथ व्यास की साम्पत्तिक स्थिति छोटेपन से ही कुछ परिस्थितियों वश अत्यन्त दीन और विकट हों गई थी । जब चारों ओर अंधकार छा जाता है तो परमेश्वर ही एक मात्र रक्षणकर्त्ता रह जाता है । कुछ कारण वश इनको, इनकी माताजी को और इनके छोटे भाइयों को मामाजी का संरक्षण प्राप्त हुआ और मामाजी ने व मौसेरे भाई ने चार वर्ष तक उनको हर प्रकार से सहायता कर मेट्रिक तक की पढ़ाई करवा दी। इन्होंने धैर्य के साथ-साथ स्वाभिमान को ही अपना भूषण माना । उन्होंने क्लर्क की नौकरी से जीवन-यात्रा शुरु की और परिवार के सम्पूर्ण दायित्व को, संघर्षपूर्ण जीवन के साथ निभाते हुए स्व-अध्ययन द्वारा बी. ए. किया । जब एम. ए., दर्शन-शास्त्र, में प्रवेश लिया तो इनका परिचय ‘संतकुलिंचा राजा’ दाते साहब से हुआ। इस प्रकार शिष्य के रूप में, प्रत्यक्ष संपर्क से, दाते साहब के परिवार से इनका सानिध्य दिन-दिन बढ़ता गया । एम.ए. होने के बाद उन्होंने (जगन्नाथ व्यास) क्लर्क की नौकरी छोड़ दी और दाते साहब की कृपा से स्कूल में वरिष्ठ अध्यापक बने । ये हर गर्मी की छुट्टियों में हमारे यहां रहते थे ।
संतों की कृपा-संपादन करने का एक मात्र सहज साधन उनकी किसी भी रूप में सेवा करना होता है । इस प्रकार इनकी गुरु-चरणों में श्रद्धा एवम् भक्ति बढ़ने से परमार्थ में रुचि बढ़ने लगी | 1951 से हमारे यहां गुरु-आज्ञा से रविवारीय (पारमार्थिक) कार्यक्रम शुरु हुआ । ये हर रविवारीय कार्यक्रम में रुचि से भाग लेते थे । श्री सद्गुरु दाते साहब के मुख्य परमार्थ प्रसार के कार्यक्रम में उन्होंने उत्साह से कार्य किया । इस प्रकार पारमार्थिक कल्याण के कार्यक्रम में दाते साहब ने जो उत्कृष्ट आध्यात्मिक ग्रन्थों का प्रकाशन किया उसमें भी ये सहायक के रूप में काम करते रहे। परिणामस्वरूप दाते परिवार से इनका अटूट सम्बन्ध स्थापित हो गया।
वर्तमान में तो श्री जगन्नाथ व्यास की योग्यता एक श्रेष्ठ सद्गुरु के श्रेष्ठ सेवक के रूप में प्रदीप्तशील है। सद्गुरु की कृपा हो तो क्या नहीं हो सकता है? अशक्य हो तो भी शक्य हो सकता है। संत तुकाराम महाराज के वचनानुसार ‘आपण तरेल नव्हे तें नवल । कुळें उद्धरील सर्वांचीं तो॥’ इनकी वजह से इनका संपूर्ण परिवार परमार्थ मार्ग में लग गया । श्री सद्गुरु कुपा से इनकी साम्पत्तिक स्थिति भी समाधानपूर्ण हो गई। अभी तो जगन्नाथ व्यास का परिवार दाते परिवार से एक हो गया है। इतना निकट सम्बन्ध श्री सद्गुरु कृपा से हो सम्भव हुआ है। अतः यह देखकर मुझे अत्यंत संतोष हुआ है।”
श्रीमान् जगन्नाथ जी व्यास हिन्दी और अंग्रेजी भाषा के अच्छे विद्वान थे। मराठी भाषा का ज्ञान उनको दर्शनशास्त्र के प्रख्यात प्रोफेसर ( डॉ. ) विनायक हरि दाते साहब के दीर्घकालीन सम्पर्क से ही प्राप्त हुआ था। वे प्रोफेसर साहब के सम्पर्क में 1956 में दर्शनशास्त्र के विद्यार्थी के रूप में आये। इतना ही नहीं वे श्री दाते महाराज के आध्यात्मिक सच्छिष्य के रूप में भी घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए थे। मराठी भाषा में लिखित महाराष्ट्रीय संतों के पारमार्थिक ग्रन्थों का श्री दाते महाराज के साहचर्य में सतत स्वाध्याय करने से श्रीमान् जगन्नाथ जी व्यास को मराठी भाषा का भी अच्छा ज्ञान हो गया था। श्री दाते महाराज ने समर्थ श्रीरामदास के ‘मनाचे-श्लोक’ का ‘मनोबोध’ शीर्षक रचना में परमार्थ-पिपासुओं के लिए हिन्दी भाषा में उत्तम गद्यानुवाद किया है। उसी को हृदयंगम करके और वहीं से प्रेरणा लेकर श्रीमान् जगन्नाथ जी व्यास ने ‘मनाचे-श्लोक’ का हिन्दी में प्रभावशाली पद्यानुवाद करने का निश्चय किया था।
श्रीमान् जगन्नाथ जी व्यास को श्री दाते महाराज के साथ एक ओर ज्ञान एवं दर्शन में दीर्घकाल तक रचने-पचने का अनुपम अवसर मिला था तो दूसरी ओर सदगुरु समर्थ श्री दाते महाराज के संग लगभग 30 वर्षों तक भक्ति-साधना की प्रखर-अग्नि में तपने का अलभ्य लाभ भी प्राप्त हुआ था। अतएव श्रीमान् जगन्नाथ जी व्यास न केवल मूर्धन्य विद्वान् ही थे वरन् एक श्रेष्ठ सन्त भी थे। उनके सन्त-स्वरूप को बहुत ही कम लोग जान पाए क्योंकि वे अपने सन्त-स्वरूप से यवनिका हटने ही नहीं देते थे।
श्री जगन्नाथ जी के जीवन में उनके गुरु डॉ. विनायक हरि दाते साहब के अतिरिक्त किसी और के लिए स्थान ही नहीं था। उनके घर की दीवारों पर छायाचित्र (photos) केवल मात्र गुरु परंपरा के संतों के लगे होते थे, उनकी वाणी डॉ. दाते के ही शब्द बोलती थी और उनके विचारों में भी डॉ. दाते के ही विचार होते थे। दाते साहब की पसंद ही उनकी पसंद थी और जो दाते साहब को पसंद ना हो वो उन्हें पसंद नहीं था। गुरू माता उनके लिए कहती थी कि दाते साहब अगर किसी वाक्य को अधूरा छोड़ दें तो जगन्नाथ जी उसे पूरा कर सकते हैं। यही नहीं कुछ शिष्यों को तो उन्होंने जगन्नाथ जी को महाराज की तरह ही समझने का कहा था।
दाते साहब ने उन्हें सन् 1979 में ट्यूशन के समय १ बार में केवल १ छात्र को ही पढ़ाने का कहा और कहा कि यदि आपको अपनी आवश्यकताओं के लिए १०० रुपये एक छात्र से ट्यूशन फ़ीस लेनी हो तो उतना लीजिए। सन् 1979 में ये बहुत बड़ी रक़म होती थी। अपने गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए सी जगन्नाथ जी ने, जब तक वे ट्यूशन पढ़ाते रहे (१९९९ तक) , अपनी फ़ीस १०० रुपये ही रखी।
गुरु धाम ६३, जसवंत सराय में उनका व्यवहार देख कर सीखने को बहुत कुछ था। गुरुधाम में वे चुप ही रहते थे और कुछ पूछने पर ही उत्तर स्वरूप कुछ बोलते थे। उनके अपने कथानानुसार जैसे वहाँ कोई उनका मुँह दबा देता था और वे कुछ बोल ही नहीं पाते थे। नेम के लिए बैठने के बाद वे नियत अवधि के उपरांत ही अपनी आँखें खोलते थे। महाराज की तस्वीर वाले मुख्य हॉल में, और बाक़ी पूरे घर में भी, वे इस प्रकार वर्तन करते थे जैसे कि स्वयं महाराज वहाँ सशरीर उपस्थित हों।
उनका दिवस नामस्मरण से प्रारंभ हो कर नामस्मरण पर ही समाप्त होता था। नामस्मरण, भजन, पोथी वाचन, छात्रों को पढ़ाना और आने वाले जिज्ञासुओं व भक्तों का मार्गदर्शन करना, यही उनके जीवन का क्रम था। प्रातः जब वे भ्रमण के लिए जाते थे तो उस स्थान तक जहां से गुरु धाम के दर्शन हो सकें वहाँ से प्रणाम कर वे वापस गृह के लिये निकल जाते थे। जब तक वे कबूतरों के चौक स्थित मकान में थे उनका ये क्रम नियमित रूप से चलता रहा।
उन्होंने दाते साहब के जीवन काल में ही बहुत सारी पुस्तकों का हिन्दी अनुवाद स्वयं के लिए किया था और इसके बारे में बहुत ही कम व्यक्तियों को पता था। “दाते महाराज के संस्मरण” नामक उनकी पुस्तक परमार्थ के लिए उनकी सेवा व दाते साहब के शिष्यों के लिए एक अनुपम भेंट है। इस पुस्तक को पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे वो वर्णित घटनायें जीवंत हो कर वर्तमान में घटित हो रही हों। इसके अतिरिक्त उन्होंने स्वामी समर्थ रामदास महाराज के ‘मनाचे श्लोक’ का पद्यात्मक अनुवाद, ‘अम्बुराव महाराजांची आठवणी’ का हिन्दी अनुवाद, और गुरुदेव रानडे की ‘Pathway to God in Hindi Literature’ का अनुवाद किया। इसके अतिरिक्त कुछ और भी अनुवाद उन्होंने किये थे जो संपूर्ण रूप में उपलब्ध नहीं हैं।
उनका नेम के प्रति आग्रह अनुपम था। अपने जीवन के अंतिम वर्ष में उन्होंने हर दिन 8-9 घंटे नेम किया ऐसा हमें उनकी डायरी से पता चलता है। उनकी डायरी से और उनके कृपापात्र कुछ व्यक्तियों के संस्मरणों से हमें पता चलता है कि आत्मज्ञानी संत होने के उपरांत भी वे अपने को गुरु नहीं मानते थे और हम सब दाते साहब के शिष्य हैं ऐसा कहते थे।
अपने जीवन के अंतिम ३ दिन वे अस्पताल में भर्ती थे। उन तीन दिनों में उन्होंने मात्र १-२ वाक्य बोले थे। वे सब त्याग कर देह त्यागने के लिये ही जैसे घर से निकले थे। माताजी के शब्दों में वे “दाते साहब के सब शिष्यों में श्रेष्ठ शिष्य” थे। २४ दिसंबर २००१ को सुबह ऐसे श्रेष्ठ शिष्य ने अपनी देह का त्याग कर दिया। किंतु आज भी समय समय पर वे अपने भाविक कृपापत्रों को स्वप्न में या अन्य प्रकार से दर्शन देकर मार्गदर्शन करते हैं।
