जगन्नाथ जी का गुरु-आश्रित जीवन

दाते साहब के प्रति पूर्ण समर्पण

श्री जगन्नाथ जी के जीवन में उनके गुरु डॉ. विनायक हरि दाते साहब के अतिरिक्त किसी और के लिए स्थान ही नहीं था। उनके घर की दीवारों पर छायाचित्र (photos) केवल मात्र गुरु परंपरा के संतों के लगे होते थे, उनकी वाणी डॉ. दाते के ही शब्द बोलती थी और उनके विचारों में भी डॉ. दाते के ही विचार होते थे। दाते साहब की पसंद ही उनकी पसंद थी और जो दाते साहब को पसंद ना हो वो उन्हें पसंद नहीं था। गुरू माता उनके लिए कहती थी कि दाते साहब अगर किसी वाक्य को अधूरा छोड़ दें तो जगन्नाथ जी उसे पूरा कर सकते हैं। यही नहीं कुछ शिष्यों को तो उन्होंने जगन्नाथ जी को महाराज की तरह ही समझने का कहा था।

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आध्यात्मिक दिनचर्या

उनका दिवस नामस्मरण से प्रारंभ हो कर नामस्मरण पर ही समाप्त होता था। नामस्मरण, भजन, पोथी वाचन, छात्रों को पढ़ाना और आने वाले जिज्ञासुओं व भक्तों का मार्गदर्शन करना, यही उनके जीवन का क्रम था।
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नेमनिष्ठा और विनम्रता

उनका नेम के प्रति आग्रह अनुपम था। अपने जीवन के अंतिम वर्ष में उन्होंने हर दिन 8-9 घंटे नेम किया ऐसा हमें उनकी डायरी से पता चलता है। उनकी डायरी से और उनके कृपापात्र कुछ व्यक्तियों के संस्मरमणों से हमें पता चलता है कि आत्मज्ञानी संत होने के उपरांत भी वे अपने को गुरु नहीं मानते थे और हम सब दाते साहब के शिष्य हैं ऐसा कहते थे।
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ज्ञान और साधना

श्रीमान्‌ जगन्नाथ जी व्यास को श्री दाते महाराज के साथ एक ओर ज्ञान एवं दर्शन में दीर्घकाल तक रचने-पचने का अनुपम अवसर मिला था तो दूसरी ओर सद्गुरु समर्थ श्री दाते महाराज के संग लगभग 30 वर्षों तक भक्ति-साधना की प्रखर-अग्नि में तपने का अलभ्य लाभ भी प्राप्त हुआ था।
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श्री जगन्नाथ व्यास

श्री जगन्नाथ व्यास (25.03.1924 – 24.12.2001) एक सरल, विनम्र और दृढ़ संकल्प वाले व्यक्ति थे। 1942 में हाई स्कूल उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने सादगी, अनुशासन और सेवा-भाव पर आधारित जीवन जिया। अपने आदर्शों और गुरु-निष्ठा को उन्होंने हमेशा जीवन में सर्वोपरि रखा, जिससे वे समाज में सम्मानित एवं प्रेरणादायी व्यक्तित्व के रूप में जाने गए।

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